महर्षि दयानन्द के शब्दों में – मूर्ति-पूजा वैसे है । जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना ।
न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यस: । – ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 3 ) उस ईश्वर की कोई मूर्ति अर्थात् – प्रतिमा नहीं जिसका महान यश है । * वेनस्त पश्यम् निहितम् गुहायाम । – ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 8 ) विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है । * अन्धन्तम: प्र विशन्ति येsसम्भूति मुपासते । ततो भूयsइव ते तमो यs उसम्भूत्या-रता: ।। – ( यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 9 ) अर्थ – जो लोग ईश्वर के स्थान पर जड़ प्रकृति या उससे बनी मूर्तियों की पूजा उपासना करते हैं ।….
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