सनातन धर्म की कुछ विशेष बातेंः
- सनातन शब्द का मतलब है ‘शाश्वत’ या ‘सदा बना रहने वाला’. इसका मतलब है कि इसका कोई आदि या अंत नहीं है.
- सनातन धर्म को दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक माना जाता है. भारत की सिंधु घाटी सभ्यता में इसके कई चिह्न मिले हैं.
- सनातन धर्म में सत्य, निष्ठां, इमानदारी, पवित्रता, दया, धैर्य, सहनशीलता, आत्म-संयम, उदारता जैसे गुणों को महत्व दिया जाता है.
- सनातन धर्म में त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु और महेश को प्रमुख आराध्य माना जाता है.
- सनातन धर्म के बारे में कुछ और महत्वपूर्ण बाते
- सनातन धर्म में ऋषि-मुनियों ने ध्यान करके ब्रह्म, ब्रह्मांड, और आत्मा के रहस्य को उजागर किया.
- वेदों में सबसे पहले ‘मोक्ष’ का वर्णन मिलता है.
- सनातन धर्म में पुनर्जन्म का विधान है
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ॐ ओ३म् (ॐ) या ओंकार परमात्मा, ईश्वर, उस एक के मुख से निकलने वाला पहला शब्द है जिसने इस संसार की रचना में प्राण डाले। ॐ, ओम की तीन मात्राएं है। अकार, उकार, और मकार जो प्रकृति के तीन गुणों को बताती है।Brahman (ब्रह्म)In Hinduism, Brahman connotes the highest universal principle, the Ultimate Reality of the universe. In major schools of Hindu philosophy, it is the non-physical, efficient, formal and final cause of all that exists.ब्रह्म हिन्दू दर्शन में इस सारे विश्व का परम सत्य है और जगत का सार है। वो दुनिया की आत्मा है। वो विश्व का कारण है, जिससे विश्व की उत्पत्ति होती है, जिस पर विश्व आधारित होता है और अन्त में जिसमें विलीन हो जाता है। वो एक और अद्वितीय है। वो स्वयं ही परमज्ञान है, और प्रकाश-स्रोत की तरह रोशन है।
अनुयायी और बिद्वान लोग इसे सनातन धर्म, अर्थात “हमेशा से मौजूद परंपरा” “शास्वत मार्ग” के रूप में मानते है. सनातन मानवता के इतिहास से भी पुराना समय से मौजूद है।
सनातन धर्म के संस्थापक के बारे में कुछ विद्वानों का मानना है कि इसका कोई संस्थापक नहीं है. ऐसा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह धर्म, भारत की कई संस्कृतियों और परंपराओं का मिश्रण है.
सनातन धर्म शब्द का इस्तेमाल “शाश्वत” या कर्तव्यों के पूर्ण समूह या धार्मिक रूप से निर्धारित प्रथाओं को दर्शाने के लिए किया जाता है, जो सभी हिंदुओं पर लागू होते हैं, चाहे वे किसी भी वर्ग, जाति या संप्रदाय के हों। अलग-अलग ग्रंथों में कर्तव्यों की अलग-अलग सूचियाँ दी गई हैं, लेकिन सामान्य तौर पर सनातन धर्म में ईमानदारी, जीवों को चोट पहुँचाने से बचना, पवित्रता, सद्भावना, दया, धैर्य, सहनशीलता, आत्म-संयम, उदारता और तप जैसे गुण शामिल हैं । सनातन धर्म की तुलना स्वधर्म से की जाती है , जो किसी व्यक्ति का “अपना कर्तव्य” या किसी व्यक्ति को उसके वर्ग या जाति और जीवन के चरण के अनुसार दिए जाने वाले विशेष कर्तव्य हैं। दो प्रकार के धर्मों के बीच संघर्ष की संभावना ( जैसे , एक योद्धा के विशेष कर्तव्यों और गैर-क्षति का अभ्यास करने के सामान्य आदेश के बीच) को भगवद गीता जैसे हिंदू ग्रंथों में संबोधित किया गया है , जहां यह कहा गया है कि ऐसे मामलों में स्वधर्म को प्रबल होना चाहिए।
इस शब्द का इस्तेमाल हाल ही में हिंदू नेताओं, सुधारकों और राष्ट्रवादियों द्वारा हिंदू धर्म को एक एकीकृत विश्व धर्म के रूप में संदर्भित करने के लिए किया गया है । इस प्रकार सनातन धर्म हिंदू धर्म के “शाश्वत” सत्य और शिक्षाओं का पर्याय बन गया है, जिसे न केवल इतिहास से परे और अपरिवर्तनीय माना जाता है , बल्कि अविभाज्य और अंततः गैर-सांप्रदायिक भी माना जाता है।
सनातन वैदिक धर्म के धर्मग्रंथ मुख्यतः संस्कृत में हैं। बाद के काल में आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी अनेक धर्मग्रन्थों की रचना हुई। हिन्दू धर्म(वैदिक धर्म) मैं ग्रंथो का पहला प्रकार है श्रृती जिसमे वेद और उपनिषद आते है इसके बाद स्मृती जिसमें पुराण,रामायण और महाभारत शामील हैं।ग्रंथों का तिसरा प्रकार है संत साहीत्य जो की बहुत प्रसिद्ध तो होते है परंतु यह साहीत्य ईश्वर द्वारा या किसी ऋषी-महर्षी द्वारा रचित ना होकर संत द्वारा लिखे गये है जिनकी संख्या अनगिनत है जिसमें मुख्य है श्रीरामचरीतमानस,ज्ञानेश्वरी,श्रीमद दासबोध,सत्यार्थ प्रकाश आदी आतेसनातन धर्म को हिन्दू धर्म या वैदिक धर्म के नाम से भी जाना जाता है. यह दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक है. भारत की सिंधु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिले हैं. कुछ पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, यह धर्म 90 हज़ार साल पुराना हैजैन, बौद्ध, सिख, आर्य समाजी एवं सनातनी हिन्दू-सभी को सनातन धर्म का अनुयायी माना जाता है. उनमें निराकार के उपासक, सगुण उपासक, मूर्तिपूजक, अद्वैत उपासक, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि सभी आते हैं.ईश्वर, आत्मा और मोक्ष सत्य है, इसलिए इस मार्ग को बताने वाला धर्म ही सनातन धर्म है और सत्य भी है। यह सत्य अनादिकाल से चल रहा है, जिसका अंत नहीं होगा। जिनका न प्रारंभ है और न अंत है उस सत्य को ही सनातन कहते हैं और यही सनातन धर्म का सत्य है।सनातन धर्म में चार नियम है जिसे धारण करना ही धर्म कहलाता है। पहला आस्था (ईश्वर है)दुसरा दया (सब जीवों में समान भाव)सत्य (कर्म से, वचन से और आचरण से शुद्ध होना) क्षमासनातन’ का अर्थ है शाश्वत और ‘धर्म’ का अर्थ है धार्मिकता का मार्ग। यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसकी जाति, वर्ग या संप्रदाय से परे कर्तव्यों का एक शाश्वत समूह निर्धारित करता है जो हजारों वर्षों में विकसित हुआ है। सनातन धर्म की जड़ें हिंदुओं के सबसे पुराने ज्ञात ग्रंथों वेदों में जाती हैंप्रत्येक व्यक्ति जो सिन्धु से समुद्र तक फैली भारतभूमि को साधिकार अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है।) सावरकर सभी भारतीय धर्मों को शब्द “हिन्दुत्व” में अनुर्भूक्त करते हैं तथा हिन्दू राष्ट्र का अपना दृष्टिकोण पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले अखण्ड भारत के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
वेद
- ऋग्वेद
- यजुर्वेद
- सामवेद
- अथर्ववेद
उपनिषद
उपनिषदों की संख्या लगभग 108 है, लेकिन मुख्य उपनिषद 10 हैं । दस उपनिषद हैं – ईशोपनिषद, कठोपनिषद, केनोपनिषद, मुण्डकोपनिषद, मांडुक्योपनिषद, ऐतरेयोपनिषद, तैतिरियोपनिषद, छान्दोग्योपनिषद, बृहदारण्यकोपनिषद और प्रश्नोपनिषद ।
पुराण
- ब्रह्मपुराण
- पद्मपुराण
- विष्णुपुराण
- वायुपुराण
- शिवपुराण
- नारदपुराण
- मार्कण्डेयपुराण
- अग्निपुराण
- भविष्यपुराण
- ब्रह्मवैवर्तपुराण
- लिंगपुराण
- वराहपुराण
- स्कन्दपुराण
- वामनपुराण
- कूर्मपुराण
- मत्स्यपुराण
- गरुड़पुराण
- ब्रह्माण्डपुराण
इतिहास
- रामायण
- महाभारत
- श्रीमद्भागवत
- देवीभागवत
- श्रीमद्भगवद्गीता – ये महाभारत का एक भाग हैं।
छः दर्शन
न्याय दर्शन, योग दर्शन, सांख्य दर्शन, पूर्वमीमांसा दर्शन, वैशेषिक दर्शन और वेदान्त दर्शन ।
आयुर्वेद
- चरक संहिता
- सुश्रुत संहिता
- अष्टांग हृदयम
प्राचीन संस्कृत ग्रंथ
चाणक्य नीति, कामंदकीय नीति, कौटलीय अर्थशास्त्र
योगग्रंथ
- योग दर्शन
हिन्दू धर्म में ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता माना जाता है. ब्रह्मा से जुड़ी कुछ खास बातेंः
- ब्रह्मा को स्वयंभू, विधाता, चतुरानन जैसे नामों से भी जाना जाता है.
- ब्रह्मा, विष्णु, और महेश को त्रिदेव कहा जाता है.
- ब्रह्मा, सृष्टि के तीन गुणों सत्व, रजस्, और तमस् में से रजस् गुण प्रधान हैं.
- ब्रह्मा के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दुनिया की रचना की है.
- ब्रह्मा के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने मनु को बनाया था, जो उनके सबसे बड़े पुत्र थे.
- ब्रह्मा के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने देवी-देवताओं, दानवों, और मनुष्यों को ‘द’ शब्द का उपदेश दिया था.
- ब्रह्मा के बारे में कहा जाता है कि याज्ञवल्क्य ऋषि उनका ही अवतार थे.
- ब्रह्मा के बारे में कहा जाता है कि वे इक्कीस ब्रह्मांडों के स्वामी हैं.
- ब्रह्मा के बारे में कहा जाता है कि वे क्षत्रियों के पुत्र हैं और उनके 10 पुत्र थे, जिन्हें मानसपुत्र कहा जाता है.
- हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा ने अपने मन से १० पुत्रों को जन्म दिया जिन्हें मानसपुत्र कहा जाता है। भागवत पुरान के अनुसार ये मानसपुत्र ये हैं- अत्रि, अंगरिस, पुलस्त्य, मरीचि, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष, और नारद हैं। इन ऋषियों को प्रजापति भी कहते हैं।
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ब्रह्मा जी के रोचक तथ्य
ब्रह्मा जी ने अपने हाथों में क्रमशः वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद और कमण्डलु धारण किए हुए हैं। ब्रह्मा जी का वाहन हंस माना जाता है। ब्रह्मा जी की पत्नी का नाम सावित्रि है। देवी सरस्वती को उनकी पुत्री माना जाता है। भगवान विष्णु की प्रेरणा से देवी सरस्वती को ब्रह्मा जी ने ही सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान कराया था। सभी देवताओं को ब्रह्मा जी का पौत्र माना गया है। यही कारण है कि उन्हें पितामह भी कहा जाता है। ब्रह्मा जी देवता, दावन तथा समस्त जीवों के पितामह माने जाते हैं।
परमपिता ब्रह्मा से ही इस सारी सृष्टि का आरम्भ हुआ। सर्वप्रथम ब्रह्मा ने पृथ्वी सहित सारी सृष्टि की रचना की। तत्पश्चात उन्होंने जीव रचना के विषय में सोचा और तब उन्होंने अपने शरीर से कुल ५९ पुत्र उत्पन्न किये। इन ५९ पुत्रों में उन्होंने सर्वप्रथम जो १६ पुत्र अपनी इच्छा से उत्पन्न किये वे सभी “मानस पुत्र” कहलाये। इन १६ मानस पुत्रों में १० “प्रजापति” एवं उनमें से ७ “सप्तर्षि” के पद पर आसीन हुए। ये सभी मानस पुत्र ब्रह्मा के अन्य पुत्रों से अधिक प्रसिद्ध हैं। पुराणों में इन्हे “साम ब्रह्मा”, अर्थात ब्रह्मा के सामान कहा गया है।वैसे तो पुराणों में उनके पुत्रों के नाम अलग-अलग दिए गए हैं किन्तु भागवत पुराण में वर्णित मानस पुत्रों को ही सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। कही कही मानस पुत्रों की संख्या १४ भी बताई गयी है क्यूंकि ४ सनत्कुमारों एवं मनु और शतरूपा को अलग-अलग नहीं गिना जाता। यदि सब को अलग-अलग गिनें तो इनकी संख्या १८ हो जाती है। :- नेत्र से अत्रि – (सप्तर्षि एवं प्रजापति): इन्होने अपनी पत्नी अनुसूया से त्रिदेवों को पुत्र के रूप में पाया। माता अनुसूया के गर्भ से ब्रह्मा के अंश से चंद्र, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय एवं शिव के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ। अपने वनवास काल में श्रीराम इनसे मिलने आये थे।
- मुख से अंगिरस – (सप्तर्षि एवं प्रजापति): परमपिता ब्रह्मा से वेदों की शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले सप्तर्षि महर्षि अंगिरा ही थे। इन्होने ने ही सर्वप्रथम अग्नि को उत्पन्न किया था। इनकी सुरूपा, स्वराट, पथ्या एवं स्मृति नामक ४ पत्नियाँ हैं। देवगुरु बृहस्पति एवं महर्षि गौतम इन्ही के पुत्र हैं। इन्होने ही रानी चोलादेवी को देवी लक्ष्मी के श्राप से मुक्ति दिलवाई थी।
- नाभि से पुलह – (सप्तर्षि एवं प्रजापति): इन्होने ब्रह्माण्ड के विस्तार में अपने पिता को सहयोग दिया था। इनकी क्षमा एवं गति नामक दो पत्नियां थी। इसके अतिरिक्त किंपुरुष भी इन्ही के पुत्र माने जाते हैं। ये महादेव के बहुत बड़े भक्त थे और कशी का पुहलेश्वर शिवलिंग इन्ही के नाम पर पड़ा है।
- हाथ से क्रतु – (सप्तर्षि एवं प्रजापति): इन्होने ने ही सर्वप्रथम वेदों का विभाजन किया था। इनकी पत्नी का नाम सन्नति था जिनसे इन्हे ६०००० पुत्रों की प्राप्ति हुई जो बालखिल्य कहलाये।
- कान से पुलस्त्य – (सप्तर्षि एवं प्रजापति): ये रावण के पितामह एवं महर्षि विश्रवा के पिता थे। इनकी प्रीति एवं हविर्भुवा नामक पत्नियां थी और महान अगस्त्य इन्ही के पुत्र माने जाते हैं।
- प्राण से वशिष्ठ – (सप्तर्षि एवं प्रजापति): ये श्रीराम के कुलगुरु थे और देवी अनुसूया की छोटी बहन अरुंधति इनकी पत्नी थी। गौ माता कामधेनु की पुत्री नंदिनी इन्ही के गौशाला में रहती थी। इन्होने राजर्षि विश्वामित्र को परास्त किया और उन्हें ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने में सहायता की।
- त्वचा से भृगु – (प्रजापति): इनका वंश प्रसिद्ध भार्गव वंश कहलाया जिस कुल में आगे चल कर भगवान परशुराम ने जन्म लिया। इन्ही के पुत्र शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु के पद पर आसीन हुए। इन्होने ने ही त्रिदेवों की परीक्षा ली और श्रीहरि को त्रिगुणातीत घोषित किया। माता लक्ष्मी भी इन्ही की पुत्री मानी जाती हैं।
- पांव के अंगूठे से दक्ष – (प्रजापति): ये प्रजापतियों में सबसे प्रसिद्ध माने जाते हैं। इनकी पुत्रियों से ही मानव वंश का अनंत विस्तार हुआ। इन्होने अपनी पत्नियों प्रसूति एवं वीरणी से ७४ कन्याओं को प्राप्त किया जिनका विवाह विभिन्न ऋषियों एवं देवों से हुआ। इन्ही की पुत्री सती महादेव की पहली पत्नी थी। इनकी पुत्रियों एवं उनके पतियों के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें।
- छाया से कर्दम – (प्रजापति): इन्होने स्वयंभू मनु की पुत्री देवहुति से विवाह कर ९ पुत्रियों – कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती एवं शान्ति तथा एक पुत्र कपिल मुनि को प्राप्त किया। इनकी पुत्रियों के विवाह भी महान ऋषियों से हुए।
- गोद से नारद: ये श्रीहरि के महान भक्त थे जिन्हे देवर्षि का पद प्राप्त है। इन्होने सनत्कुमारों को दीक्षा देकर संन्यासी बना दिया जिससे क्रुद्ध होकर इनके पिता ब्रह्मा ने इन्हे एक जगह स्थिर ना होने का श्राप दे दिया। तब से ये सर्वत्र विचरण करते रहते हैं। देव और दैत्य दोनों इनका सम्मान करते हैं।
- इच्छा से ४ सनत्कुमार: इन चारों को ब्रह्मा ने मैथुनी सृष्टि रचने के लिए उत्पन्न किया किन्तु देवर्षि नारद ने इन्हे दीक्षा देकर संन्यासी बना दिया। तब ब्रह्मा ने नारद को स्थिर ना रहने का और इन चारों को ५-५ वर्ष के बालक रूप में रहने का श्राप दिया। ये महादेव के अनन्य भक्त हैं। इन्होने ही श्रीहरि के पार्षदों जय एवं विजय को श्राप दिया जिससे वे तीन जन्मों तक पृथ्वी पर भटकते रहे एवं श्रीहरि के अवतारों द्वारा मुक्ति प्राप्त की। ये हैं:
- सनक
- सनन्दन
- सनातन
- सनत्कुमार
- शरीर से मनु एवं शतरूपा: सनत्कुमारों के संन्यास ग्रहण करने के पश्चात ब्रह्मा ने अपने शरीर से स्वयंभू मनु एवं शतरूपा को प्रकट किया जिनसे अनंत पुत्र-पुत्रियों की उत्पत्ति हुई। मनु के नाम से ही हम मानव कहलाते हैं। ये ही प्रथम मन्वन्तर के अधिष्ठाता हैं एवं इन्ही के शासन काल में ब्रह्मा के सात ऋषि पुत्रों ने सप्तर्षि का कार्य भार संभाला।
- वाम अंग से शतरूपा
- दक्षिण अंग से स्वयंभू मनु
- धयान से चित्रगुप्त: ये कायस्थ वंश के जनक हैं और यमराज के मंत्री के रूप में इनकी प्रतिष्ठा है। सभी इंसानों के कर्मों का लेखा-जोखा यही रखते हैं। इन्होने दो कन्याओं – इरावती एवं नंदिनी से विवाह किया जिससे १२ पुत्र जन्में जिससे समस्त कायस्थ वंश चला।
मन से मरीचि – (सप्तर्षि एवं प्रजापति): इन्हे द्वितीय ब्रह्मा भी कहा जाता है। इनकी सम्भूति, कला एवं ऊर्णा नामक तीन पत्नियां थी। ऋषियों में श्रेष्ठ महर्षि कश्यप इन्ही के पुत्र हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि – “मरुतों में मैं मरीचि हूँ।” इस एक वाक्य से ही इनकी महत्ता समझ में आती है।
- वसिष्ठ वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। वे उन सात ऋषियों (सप्तर्षि) में से एक हैं जिन्हें ईश्वर द्वारा सत्य का ज्ञान एक साथ हुआ था और जिन्होंने मिलकर वेदों का दर्शन किया (वेदों की रचना की, ऐसा कहना अनुचित होगा क्योंकि वेद तो अनादि है)। उनकी पत्नी अरुन्धती हैं। वह योग-वासिष्ठ में राम के गुरु हैं। वशिष्ठ राजा दशरथ के राज गुरु भी थे।वसिष्ठ ब्रम्हा के मानस पुत्र थे। त्रिकालदर्शी ऋषि थे। विश्वामित्र ने कामधेनु गाय के लिए इनके 100 पुत्रों को मार दिया था, फिर भी इन्होंने विश्वामित्र को क्षमा कर दिया। सूर्य वंशी राजा इनकी आज्ञा के बिना कोई धार्मिक कार्य नही करते थे। त्रेता के अंत मे ये ब्रम्हा लोक चले गए थे।आकाश में चमकते सात तारों के समूह में पंक्ति के एक स्थान पर वसिष्ठ को स्थित माना जाता है। अंग्रेज़ी में सप्तर्षि तारसमूह को बिग डिपर या ग्रेट बियर (बड़ा भालू) कहते हैं और वशिष्ठ-अरुंधती को अल्कोर-मिज़र कहते हैं।
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सप्तर्षिसप्तर्षि (सप्त + ऋषि) सात ऋषियों को कहते है जिनका उल्लेख वेद एवं अन्य हिन्दू ग्रन्थों में अनेको बार हुआ है।
- वेदो का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियो या ऋषि कुल के नमो का पता चलता है और नाम क्रमश: इस प्रकार है:-
- 1.वशिष्ठ, 2.विश्वामित्र, 3.कण्व, 4.भारद्वाज, 5.अत्रि, 6.वामदेव 7.शौनक।
पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण के अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-
- वशिष्ठकाश्यपोऽत्रिर्जमदग्निस्सगौतमः।
- विश्वामित्रभरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।
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- अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।
इसके अलावा अन्य पुराणों के अनुसार सप्तऋषि की नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वसिष्ठ और मरीचि है।
महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो
दूसरी नामावली के अनुसार सप्तर्षि – कश्यप, वशिष्ठ, मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है
1. वशिष्ठ : राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने दोनों पुत्रों (श्री राम एवं श्री लक्ष्मण) को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में असुरों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।
2. विश्वामित्र : ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य क़िस्से हैं।
माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहाँ शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हज़ारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।
3. कण्व : माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।
4. भारद्वाज : वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।
ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम ‘रात्रि’ था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। ‘भारद्वाज-स्मृति’ एवं ‘भारद्वाज-संहिता’ के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने ‘यन्त्र-सर्वस्व’ नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने ‘विमान-शास्त्र’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।
5. अत्रि : ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, दुर्वासा , चन्द्र और दत्तात्रेय के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा माँगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।
अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहाँ उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।
6. वामदेव : वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।
7. शौनक : शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।
फिर से बताएँ तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।
इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।
- वशिष्ठ का विवाह दक्ष प्रजापति और प्रसूति की पुत्री अरुंधती से हुआ था।
- सनातन धर्म में ऋषि-मुनियों ने ध्यान करके ब्रह्म, ब्रह्मांड, और आत्मा के रहस्य को उजागर किया.