तत्वमसि
वेद में कई महावाक्य हैं नेति नेति (यह भी नही, यह भी नहीं) अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) अयम् आत्मा ब्रह्म (यह आत्मा ब्रह्म है) यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे (जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है) वेद की व्याख्या इन महावाक्यों से होती है। उपनिषद उद्घोष करते हैं कि मनुष्य देह, इंद्रिय और मन का संघटन मात्र नहीं है, बल्कि वह सुख-दुख, जन्म-मरण से परे दिव्यस्वरूप है, आत्मस्वरूप है। आत्मभाव से मनुष्य जगत का द्रष्टा भी है और दृश्य भी। जहां-जहां ईश्वर की सृष्टि का आलोक व विस्तार है, वहीं-वहीं उसकी पहुंच है। वह परमात्मा का अंशीभूत आत्मा है।….
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