“चरैवेति चरैवेति”
“चरैवेति चरैवेति” ऐतरेय ब्राह्मण 1: कठोर परिश्रम करने वाले व्यक्ति को ही भांति-भांति की श्री यानी वैभव/संपदा प्राप्त होती हैं , एक ही स्थान पर निष्क्रिय बैठे रहने वाले विद्वान व्यक्ति तक को लोग तुच्छ मानते हैं । विचरण में लगे जन का इन्द्र यानी ईश्वर साथी होता है । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) । ‘श्री’ से यहां मतलब केवल भौतिक संपदा से नहीं है बल्कि स्थान-स्थान पर विचरण करने से प्राप्त ज्ञान, भांति-भांति के लोगों से प्राप्य अनुभव, उनसे सीखे गए कर्म-संपादन का कौशल, आदि हे । इंद्र बताना चाहते हैं कि….
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